
“कोटवार भर्ती में खेल या साजिश? आदिवासी परिवार का हक छीना, तहसील प्रशासन पर गंभीर आरोप
पन्ना जिले के शाहनगर तहसील में कोटवार भर्ती को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप सीधे-सीधे भ्रष्टाचार, नियमों की अनदेखी और आदिवासी परिवार के अधिकारों के हनन से जुड़े हैं। पूरा प्रकरण अब केवल एक भर्ती विवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल बन गया है।ग्राम कचौरी निवासी आवेदक रामदास भूमियां ने बताया कि जो वर्षों से कोटवार के पद पर कार्यरत थे, आरोप लगाया है कि उन्हें अचानक और बिना पूर्व सूचना के 6 मार्च 2025 को 62 वर्ष की आयु पूर्ण होने का हवाला देकर पद से हटा दिया गया। सबसे गंभीर बात यह है कि उन्हें न तो समय पर वेतन दिया गया और न ही सेवानिवृत्ति से जुड़ी कोई स्पष्ट प्रक्रिया अपनाई गई।
लगभग एक वर्ष बाद रिटायरमेंट का आदेश थमा देना प्रशासन की कार्यशैली पर संदेह को और गहरा करता है।मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू तब सामने आता है जब रामदास भूमियां के पुत्र दिलीप सिंह का नाम सामने आता है। दिलीप सिंह को ग्रामसभा और पंचायत द्वारा सर्वसम्मति से कोटवार पद के लिए अनुशंसित किया गया था। सामान्य प्रक्रिया के अनुसार स्थानीय स्तर पर सहमति को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन इस मामले में उस अनुशंसा को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।आरोप है कि तहसील कार्यालय में कार्यरत एक कथित “प्राइवेट बाबू” देवीदीन चौधरी को नियमों को दरकिनार कर कोटवार पद पर नियुक्त कर दिया गया। यह नियुक्ति न केवल प्रक्रिया पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक मिलीभगत से नियमों का उल्लंघन हुआ है।
रामदास भूमियां का कहना है कि वह पिछले आठ महीनों से न्याय की उम्मीद में तहसील कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें न तो कोई स्पष्ट जानकारी दी जा रही है और न ही संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसके उलट, उन्हें बार-बार परेशान किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं, जिससे उनकी पीड़ा और बढ़ गई है।इस पूरे मामले की शिकायत 1 अप्रैल को शाहनगर के अनुविभागीय अधिकारी (SDM) राजस्व को लिखित रूप में दी गई थी, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है। इतना गंभीर मामला होने के बावजूद प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है—क्या वाकई कहीं न कहीं इस पूरे घटनाक्रम में मिलीभगत है?2 अप्रैल को आवेदक एक बार फिर SDM कार्यालय पहुंचा और मीडिया के सामने अपनी व्यथा रखी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला, तो वह उच्च स्तर पर शिकायत करने के लिए मजबूर होंगे।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर नियमों को दरकिनार कर यह नियुक्ति कैसे की गई? क्या आदिवासी परिवार के अधिकारों के साथ अन्याय हुआ है? और यदि हुआ है, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?यह मामला केवल एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं, बल्कि सिस्टम की पारदर्शिता और न्याय व्यवस्था की परीक्षा बन गया है। आवेदक ने फर्जी नियुक्ति को निरस्त करने और दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस मामले में क्या कदम उठाता है—न्याय या फिर



